अपनी पशेमानियाँ पोशीदा रखने में माहिर सा है।
इक मुस्कुराहट सी बना रखता है अपने उस चेहरे पर,
जो हसीन तो है पर लम्हा ए खुशी उसपे मुख्तसर सा है।
इश्क है, बेशक, इश्क तो है
दबा रखा है दुनिया की रवायतों की खातिर,
गर ज़ाहिर हो अंदाज़ में तो मुखौटे चढ़ा लेते हैं,
जो धड़कने समझते हैं तेरी, उन्हें मालूम है,
मुखौटों के पीछे का इंसाँ मगर मुतबर्रिक सा है।
तेरे माज़ी के ज़ख्मों से तेरी रूह भी तार-तार हो गयी है,
तेरी इंसानियत फिर भी इस जहाँ से पार लगती है,
चाहता हूँ तेरे ज़ख़्मों पर अपनी चाहत का मरहम रख दूँ,
पर तेरी पाकीज़ा सीरत के सामने मेरी ये आरज़ू भी नागवार लगती है।
