इक दौर सा चलता मालूम होता है,
दिलों से निकलती आयतें ग़ायब हैं
मुखौटों का बाज़ार गरम लगता है,
चेहरों से मुस्कुराहटें ग़ायब हैं...
हर मोड़ पर किसी रुसवाई की आहट है,
हर पल किसी ग़म का अंदेशा है
कोई गैरों के पहलू में बैठा है,
घर से मोहब्बतें ग़ायब हैं...
माँ की आँखों में नमी है,
पिता के दिल में इक इंतज़ार है,
कुछ पाने की इस कशमकश में,
रिश्तों की हरारत ग़ायब है...
दूरियाँ कदमों की नहीं दिलों में बढ़ सी गई हैं,
दोस्तों का इंतज़ार अब कम है,
भागते रहने की रिवायत के बीच,
वो मीठी बातें मुलाकातें ग़ायब हैं...
गर्मियां कुछ ठंडी पड़ी हैं,
सर्दियों में भी मिलावट है,
बारिश के मौसम से भी आज,
वो सौंधी खुश्बुऐं ग़ायब हैं...
इक दौर सा चलता मालूम होता है,
दिलों से निकलती आयतें ग़ायब हैं
मुखौटों का बाज़ार गरम लगता है,
चेहरों से मुस्कुराहटें ग़ायब हैं...
