Monday, March 11, 2013

आज फिर उस दरीचे से होकर गुज़रे जहाँ तेरी यादों का जहाँ आबाद था,


आज उन पत्थरों को लोग पत्थर कहा करते हैं

उन्हें क्या मालूम वो उन लम्हों के गवाह हैं,

जिन लम्हों में अब हम ज़िन्दगी गुज़ारा करते हैं...



हमारी मुलाकातों की एक दास्तान वहाँ बसती है,

उन जज्बातों को अपना मज़हब कहा करते हैं

दुनिया वालों को क्या समझाएं अब,

की क्यूँ हम तुझे अपना ख़ुदा कहा करते हैं...



क्या बताएं तुझे हम अपनी बेबसी मेरे हमराज़,


प्यार तो हम भी तुझसे बेपनाह करते हैं,

कहीं लग जाये न ठेस दिल को तेरी फुर्कत से,

इसलिए तुझसे इक दूरी बनाये रखते हैं...


Saturday, March 2, 2013

ज़िंदा

आज अचानक एक ख्याल पर दिल ठहर गया,


क्या आज वाकई मैं जिंदा हूँ?



मैं समझ नहीं पाया की खुद को क्या जवाब दूँ,

शायद एक मैं ही तो हूँ जो खुद को जानता हूँ इस जहाँ में,

मैं ही तो हूँ जिसे पता है की मेरा एक हिस्सा आज भी वहां है,

जहाँ हमने एक दुसरे के हाथों में हाथ दिया था,

जब पहली बार तुमने मेरी आँखों में देख कर प्यार का इज़हार किया था,

और शायद एक हिस्सा वहां भी जहाँ से तुम्हे आखिरी बार देखा था,

अपनी ज़िन्दगी से हमेशा के लिए जाते हुए...



आज शायद दुनिया को मैं एक नज़र आता हूँ,

लेकिन उन हिस्सों का हिसाब किसे पता जो कहीं ठहर गए..

उन्हें लगता है की मैं आगे बढ़ गया हूँ,

लेकिन मैं तो जानता हूँ की मैं आज भी उसी वक़्त में ठहरा हुआ हूँ...



आज भी एक एहसास उसी लम्हे को जी रहा है जब तुम दिल के करीब थे,

शायद आज भी साँसों को उस हवा का सहारा मिला हुआ है

जब मैं खुल के साँस लिया करता था,

जब खुली हवाओं में इतनी घुटन नहीं हुआ करती थी,

जब अपनी साँसों का हिसाब नहीं रखना पड़ता था,

शायद तब.. तब मैं जिंदा था...