Saturday, April 27, 2013

दोस्ती की शाम

आज फिर एक दोस्ती की शाम हो गयी,
फिर हमारी चाहत बदनाम हो गयी,
फिर दिल के इक हिस्से को मौत आ गयी,
और उसमें जज़्ब मेरी हसरतें तमाम हो गयीं...

हमने पूछा क्यूँ छोड़े जाते हो हमें ऐ दोस्त,
वो बोले बस तेरी आदत हो जाने से घबराते हैं,
हम हो नहीं सकते तेरे कभी इसलिए,
पहले ही तुमसे दूर हुए जाते हैं.
हमने पूछा दिल को कैसे समझायेंगे हम और तुम,
वो बोले दिल का क्या है वो तो नादान है,
कुछ दिन तडपेगा फिर खुद ही संभल जायेगा,
आजकल दिल से कहाँ दिमाग से दिल लगाते हैं...
हम समझ न पाए क्या कहें इसके आगे हम,
क्या दिल से दिल लगाना ही हमारा गुनाह बन गया
क्या हमने जो प्यार में हदें उठा रखी थीं,
क्या वो हमें उसकी सज़ा दिए जाते हैं?
ये समझने की हमारी सारी कोशिश नाकाम हो गयी,
बस आज फिर एक दोस्ती की शाम हो गयी...

हमने खुद से पूछा क्या सोचा है ज़िन्दगी के लिए,
जिन्हें दुनिया समझते थे वो तो दुनिया के लिए तुम्हे छोड़ गए,
अन्दर से एक आवाज़ आयी "ऐ नादाँ,
अब भी तुम जिंदा होने की बात किये जाते हो,
अब तो बस साँसे ही चल रही हैं वरना,
दिल-ओ-जान तो वो सनम ही लिए जाते हैं...
उनकी सोच जिनका तेरी साँसों पर भी क़र्ज़ है,
कहीं उनकी अमानत में ख़यानत न हो,
कहीं उनको ये एहसास न हो जाये कि अब,
ज़ीस्त भी एक अज़ाब सी हो गयी अपनी,
वो भी तो तेरी हर सांस पर एक ख़ुशी के लिए,
अपनी हर ख़ुशी को कुर्बान किये जाते हैं...

Sunday, April 14, 2013

तेरी आँखों से गिरे आंसुओं को अपने दिल में छुपा लिया हमने,
तेरा नाम भी लिया मगर दुनियाँ को सुनाया नहीं,
तेरी दोस्ती पर दिल जान भी लुटा सकते हैं हम,
फर्क ये है कभी तुझको भी हमने ये बताया ही नहीं...

क्या कहता तेरे बिन बहुत अकेला हूँ मैं,
जानता था तुझ पर ये भी एक ज़ुल्म ही हो जाता,
जो किसी ग़ैर की आँखों के आँसू न देख पाता हो,
उसको अपने दिल का दर्द दिखाता कैसे,
ऐसा तो न था की तुझको एहसास न था,
क्यूँ हमने अपना ग़म-ए-दिल तुमको सुनाया ही नहीं,
नाम हर वक़्त तेरा दिल में गूंजता रहता है,
बस कभी उसको अपनी जुबां तक लाया ही नहीं...

ये मत सोच की रिश्ता ख़त्म हो गया अपना,
बस ज़रा श़क्ल बदल गयी है उसकी,
पहले तुझे सामने देख कर जन्नत का नज़ारा करते थे,
अब अपनी यादों में ही मिल पाते हैं तुझसे,
दोस्ती कब कह कर निभाई है हमने,
ये हुनर रब ने हमको सिखाया ही नहीं,
हर वक़्त तेरे आस पास ही रहते हैं,
शायद तेरे आँसुओं में तुझको नज़र आया ही नहीं...

तेरी दोस्ती पर दिल जान भी लुटा सकते हैं हम,
फर्क ये है कभी तुझको भी हमने ये बताया ही नहीं...

Monday, March 11, 2013

आज फिर उस दरीचे से होकर गुज़रे जहाँ तेरी यादों का जहाँ आबाद था,


आज उन पत्थरों को लोग पत्थर कहा करते हैं

उन्हें क्या मालूम वो उन लम्हों के गवाह हैं,

जिन लम्हों में अब हम ज़िन्दगी गुज़ारा करते हैं...



हमारी मुलाकातों की एक दास्तान वहाँ बसती है,

उन जज्बातों को अपना मज़हब कहा करते हैं

दुनिया वालों को क्या समझाएं अब,

की क्यूँ हम तुझे अपना ख़ुदा कहा करते हैं...



क्या बताएं तुझे हम अपनी बेबसी मेरे हमराज़,


प्यार तो हम भी तुझसे बेपनाह करते हैं,

कहीं लग जाये न ठेस दिल को तेरी फुर्कत से,

इसलिए तुझसे इक दूरी बनाये रखते हैं...


Saturday, March 2, 2013

ज़िंदा

आज अचानक एक ख्याल पर दिल ठहर गया,


क्या आज वाकई मैं जिंदा हूँ?



मैं समझ नहीं पाया की खुद को क्या जवाब दूँ,

शायद एक मैं ही तो हूँ जो खुद को जानता हूँ इस जहाँ में,

मैं ही तो हूँ जिसे पता है की मेरा एक हिस्सा आज भी वहां है,

जहाँ हमने एक दुसरे के हाथों में हाथ दिया था,

जब पहली बार तुमने मेरी आँखों में देख कर प्यार का इज़हार किया था,

और शायद एक हिस्सा वहां भी जहाँ से तुम्हे आखिरी बार देखा था,

अपनी ज़िन्दगी से हमेशा के लिए जाते हुए...



आज शायद दुनिया को मैं एक नज़र आता हूँ,

लेकिन उन हिस्सों का हिसाब किसे पता जो कहीं ठहर गए..

उन्हें लगता है की मैं आगे बढ़ गया हूँ,

लेकिन मैं तो जानता हूँ की मैं आज भी उसी वक़्त में ठहरा हुआ हूँ...



आज भी एक एहसास उसी लम्हे को जी रहा है जब तुम दिल के करीब थे,

शायद आज भी साँसों को उस हवा का सहारा मिला हुआ है

जब मैं खुल के साँस लिया करता था,

जब खुली हवाओं में इतनी घुटन नहीं हुआ करती थी,

जब अपनी साँसों का हिसाब नहीं रखना पड़ता था,

शायद तब.. तब मैं जिंदा था...