मैं ख़फा तो नहीं, हाँ कुछ टूट सा गया है अंदर
इक चुभन सी है कहीं, इक ख़लिश सी है
तल्ख लफ़्ज़ों के खंजर दिल में पैवस्त हैं और
हर गुज़रते लम्हे में ज़िंदगी भी अज़ाब सी है...
सोचता हूँ कहूँ कुछ, लब हिलते हैं पर आवाज़ नहीं आती कोई,
वो हसरतें, वो ख्वाहिशें, वो अशार और गुज़ारिश कुछ,
है इक गुबार सा अंदर मगर बाहर नहीं है कुछ...
Friday, December 25, 2020
कुछ
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