Friday, December 25, 2020

कुछ

मैं ख़फा तो नहीं, हाँ कुछ टूट सा गया है अंदर
इक चुभन सी है कहीं, इक ख़लिश सी है
तल्ख लफ़्ज़ों के खंजर दिल में पैवस्त हैं और
हर गुज़रते लम्हे में ज़िंदगी भी अज़ाब सी है...
सोचता हूँ कहूँ कुछ, लब हिलते हैं पर आवाज़ नहीं आती कोई,
वो हसरतें, वो ख्वाहिशें, वो अशार और गुज़ारिश कुछ,
है इक गुबार सा अंदर मगर बाहर नहीं है कुछ...

Wednesday, April 1, 2020

मुख्तलिफ

वो चेहरा वो आँखें कुछ मुख्तलिफ अंदाज़,
वो लबों पे इठलाती इक मुख़्तसर सी हँसी,
और वो ज़ुल्फ़ों में बहकती कुछ बेबस सी हवा ,
यकीं है मुझे कि मैंने पहले भी तुझको कहीं देखा है.

कोई अरमान कोई ख़्वाब कहीं तो बसेरा है तेरा,
कोई तो इक मुकम्मल जहां जहाँ बसेरा है तेरा ,
कुछ शोख़ निगाहें एक पाकीज़ा सूरत,
और होठों पर ठहरे हुए वो नम अल्फाज़,
यकीं है मुझे कि मैंने पहले भी तुझको कहीं देखा है