Sunday, October 29, 2017

वजूद

हर बार जब तेरे दर से उठता हूँ,
एक कतरा अपने वजूद का वहीं छोड़ आता हूँ मैं
तेरे हाथों से जब छूटती हैं उंगलियाँ मेरी,
मानो ज़रा ज़रा सा टूट जाता हूँ मैं|

वो दिन ना रहे वो राहें ना रहीं जिन्हें अपना कहते थे हम,
कोई शिकवा या शिकायत भी नहीं है उनके ना होने का,
तेरा होना हर एहसास से ऊपर है मेरे हमसफर,
क्योंकि तू खुद ही तो मेरा है और मुझमें भी पूरा है
तेरे जाने के एहसास को सोचकर भी रूठ जाता हूँ मैं