Saturday, June 25, 2022

नुमायाँ

जानता हूँ वो नुमायाँ तो नहीं मगर ज़ाहिर सा है,
अपनी पशेमानियाँ पोशीदा रखने में माहिर सा है।
इक मुस्कुराहट सी बना रखता है अपने उस चेहरे पर, 
जो हसीन तो है पर लम्हा ए खुशी उसपे मुख्तसर सा है।

इश्क है,  बेशक, इश्क तो है
दबा रखा है दुनिया की रवायतों की खातिर, 
गर ज़ाहिर हो अंदाज़ में तो मुखौटे चढ़ा लेते हैं, 
जो धड़कने समझते हैं तेरी, उन्हें मालूम है,
मुखौटों के पीछे का इंसाँ मगर मुतबर्रिक सा है।

तेरे माज़ी के ज़ख्मों से तेरी रूह भी तार-तार हो गयी है, 
तेरी इंसानियत फिर भी इस जहाँ से पार लगती है, 
चाहता हूँ तेरे ज़ख़्मों पर अपनी चाहत का मरहम रख दूँ, 
पर तेरी पाकीज़ा सीरत के सामने मेरी ये आरज़ू भी नागवार लगती है।

चेहरा

जब से तू मिला है ऐसा लगता है कुछ तो बदला है कहीं, 
मुद्दतों बाद दिल में कोई चाहत सी जगी है । 
ये जिंदगी यूँ ही गुज़रे जाती थी, 
फिर ख्वाहिशों की आहट सी हुई है कोई। 
जब आता है हाथों में तेरा हाथ, दिन खुशगवार हो जाता है,
तेरी नज़रे इनायत से ज़र्रा-ज़र्रा बेशुमार हो जाता है।
माना देख सकते नहीं उस चेहरे को अभी, 
पर उन लकीरों की गहराई दिल में महसूस किया करते हैं...

Friday, May 13, 2022

मैं

शीशे पर पड़ी एक पानी की बूँद सा हो गया हूँ,
ना कहीं जज़्ब होता हूँ ना ही स्थिरता है कोई। 
बस एक इंतज़ार किसी ओर बह जाने का, 
या फिर कोई तपिश जो फना कर दे।।

संगतराश हूँ, टूटी मूर्तियाँ बटोरता हूँ,
लगा के कुछ हिस्से खुद के, पूरा करने की कोशिश में,
कुछ चुभ जाता है, कभी हाथों में, कभी दिल में
मगर एक सुकून है मूर्तियाँ पूरी करने में
और इस तरह से एक ही जीवन में कई ज़िंदगी जीता हूँ मैं।।

पर्वत हूँ, बादलों की सराय सरीखा
कोई भरा हुआ बादल आकर रुकता है, बरसता है
खाली होकर आगे बढ़ जाता है,
हाँ कभी कभी कोई बादल कुछ वक्त ठहर भी जाता है
लगता है मानो जुड़ गया हो, पर ऐसा कहाँ होता है
कोई हवा आती है और उसे ले जाती है
पर्वत खड़ा रहता है उस बरसात के अंश खुद में समेटे, 
अपने अंदर बसाये अपना हिस्सा बनाकर।।