Monday, January 11, 2021

ख़्वाब

आज फिर इन आँखों में एक ख़्वाब की दस्तक हुई,
वो ख़्वाब जो खुली आँखों से देखे थे हमने,
वो ख़्वाब जिनमें तेरा साथ था और तेरा एहसास भी,
वो ख़्वाब जिनमें तेरा तसव्वुर भी पाया हमने.

ये ख़्वाबों की जात भी कुछ अजीब सी होती है,
होते तेरे हैं, पर होते मेरे करीब हैं,
ये ख़्वाबों की जात भी कुछ अजीब सी होती है,
कितना चाहो कि ना आयें पर लगते अजीज़ हैं

ख़्वाब जिनके पूरे होने की ख़्वाहिश भी ना हो,
ख़्वाब जिनके छूट जाने का फ़िक्र भी नहीं,
ख़्वाब जिनमें मेरा वजूद भी ना हो,
ख़्वाब जिनमें मेरे हाल-ए-दिल का ज़िक्र भी नहीं

वो ख़्वाब जो ज़माने को समझ ना आयें कभी,
वो ख़्वाब जो ज़माने को दिखाए भी नहीं, 
वो ख़्वाब जिनमें एक तेरा ही दीदार करते रहते हैं,
वो ख़्वाब इक अर्से से जिनसे हम बाहर आये भी नहीं.

वो ख़्वाब जो इक जिंदगी का अक्स सा लगते हैं,
वो ख़्वाब जिनमें यूँ गुज़र जाने का ग़म ना हो,
वो ख़्वाब जिनमें तन्हाइयों की परछाइयाँ भी नहीं,
वो ख़्वाब जिनमें प्यार के सिवा कोई मौसम ना हो.

आज फिर इन आँखों में एक ख़्वाब की दस्तक हुई,
वो ख़्वाब जो खुली आँखों से देखे थे हमने...

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