Thursday, February 25, 2016

रात की कश्मकश

इस रात की भी अपनी एक कश्मकश है,
कुछ छुपाती सी, कुछ जगाती सी,
एक अजीब सी तन्हाई मानों पशेमाँ सी होती है,
यूँ तेरे दीदार के ख़्वाब दिखाती सी,

खुली आँखों में कुछ अश्क उभरते हैं, बंद आँखों में तेरा चेहरा,
एक अज़ाब सा लगता है इन रातों का गुज़रना,
वो मोड़ जहाँ से ज़िन्दगी मुड़ गयी थी हमारी आँखों के सामने,
आज भी कुछ लम्हे वहां तलाशते हैं वही कोई अपना,
किसी हमसफ़र सी साथ साथ चलती रहती है,
ये रात आज भी तेरा एहसास दिलाती है.
लगता है मानों आज भी इन हाथों में तेरा हाथ लिए
हम बेफिक्रे से गुज़रते हैं,
इस दुनिया को अपने प्यार का एक अंदाज़ दिखाते से,
और कुछ ठंडी आहों को अपने दामन में समेटे हुए,
यूँ रात भी चलती है कुछ इठलाती सी
इस रात की भी अपनी एक कश्मकश है,
कुछ छुपाती सी, कुछ जगाती सी...