Sunday, July 29, 2018

दस्तक

सरे रात जो मेरे ख्वाबों में दस्तक दी है तुमने,
लगता है कोई ठेस लगी है तेरे दिल में.
कोई तार सा खिंच गया है कहीं किसी कोने में,
फिर कोई बात तो उठी है तेरे दिल में...

माज़ी ने क्या फिर से पहलू बदला है,
या फिर कोई टीस उठी है बंद ज़ख्मों से,
बीते जज़्बातों का जज़ीरा फिर से बह निकला है,
या ज़िक्र ए मुहब्बत को नकारा है फिर तेरे दिल ने???

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