अगर नाराज़ होकर तुमने हमको मुस्कुराने की सज़ा दी है,
तो मानो हम भी अपने ग़म ये सारे भूल कर वादा निभाएंगे.
बिन तेरे कोई वजह तो नहीं है जीने की,
मगर ले कर साँसें कई एहसान चुकाएंगे हम...
इस मुख़्तसर सी ज़िन्दगी को यूँ थाम कर फिरते हैं,
तेरे अरमानों को ख्वाबों में पिरोये हुए,
ज़हन में गूँजती मुख़्तलिफ आवाज़ों के बीच,
और अपने इश्क़ को बे लौस रखने की कशमकश में,
मानो कोई कर्ज़ लिया हो और साँसें किसी साहूकार सी
तकादा करती दरवाज़े पर दस्तक देने आ जाती हैं.

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