तेरे इस शहर में जाने पहचाने चेहरों के बीच कुछ गुमशुदा सा है...
कुछ रिवायतें और एक अहसास...
दोस्तों के कहकहे, वो खुशनुमा लम्हे,
वो शाम, वो चाय की चुस्किय़ां, वो बेबाक लहजा,
वो उतरते दिन की ओर देखती निगाहें और इक रिवायत अपनों के पास लौट आने की,
जाने कहाँ खो गयी हैं तेरे इस शहर की चकाचौंध में
इस भागती सी ज़िंदगी में कहीं पीछे बहुत पीछे छूट गयी हैं...
कुछ रिवायतें और एक अहसास...
बहनों की राखी, वो होली-दिवाली,
वो पास का मेला वो ऊँचा सा झूला,
वो छोटी सी ईदी, वो ज़रा सी त्यौहारी,
और उसमें लिपटे हुए वो बेइंतहा अहसास अपनी खुशियाँ मनाने की
मोहताज हैं किसी ग़ैर की सरनवाज़ी की
कुछ पाने की हसरत में अपने घर से लुट जाने दे रहे हैं हम...
कुछ रिवायतें और एक अहसास...
माँ का वो आँचल, पिता की वो ऊँगली
जिसे थाम कर इस शहर तक हैं पहुँचे,
वहीं तक ना लौट पाने की लाचारी,
और अपनी आवाज़ में लरजती हुई बेबसी को छुपाने को गले में खारिश का वो बहाना,
कौन जाने कहाँ तक संभलते हैं भरे दिल में ये अहसास,
और जाने कब अपने जज़्बातों का बांध तोड़ कर बह निकलेंगे इस दिल से...
कुछ रिवायतें और एक अहसास...

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