Monday, March 11, 2013

आज फिर उस दरीचे से होकर गुज़रे जहाँ तेरी यादों का जहाँ आबाद था,


आज उन पत्थरों को लोग पत्थर कहा करते हैं

उन्हें क्या मालूम वो उन लम्हों के गवाह हैं,

जिन लम्हों में अब हम ज़िन्दगी गुज़ारा करते हैं...



हमारी मुलाकातों की एक दास्तान वहाँ बसती है,

उन जज्बातों को अपना मज़हब कहा करते हैं

दुनिया वालों को क्या समझाएं अब,

की क्यूँ हम तुझे अपना ख़ुदा कहा करते हैं...



क्या बताएं तुझे हम अपनी बेबसी मेरे हमराज़,


प्यार तो हम भी तुझसे बेपनाह करते हैं,

कहीं लग जाये न ठेस दिल को तेरी फुर्कत से,

इसलिए तुझसे इक दूरी बनाये रखते हैं...


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